तीन छोटे सूअर
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कहानी में क्या होता है
तीन छोटे सूअर माँ का घर छोड़कर अपने-अपने घर बनाते हैं: एक भूसे का, एक डंडियों का और एक ईंटों का। भेड़िया ज़ोर से फूँकता है, पर सिर्फ़ ईंटों का घर अपनी जगह टिका रहता है। तीनों साथ में सुरक्षित रहते हैं और सीखते हैं कि मेहनत का फल मिलता है।

एक बार की बात है, एक गाँव की पगडंडी के आख़िर में एक छोटी-सी झोपड़ी थी। उसमें तीन छोटे सूअर अपनी माँ के साथ रहते थे। एक सुबह धूप खिली थी। माँ ने तीनों का खाना तीन बूटेदार रुमालों में बाँध दिया। माँ बोली, "अब तुम बड़े हो गए हो। जाओ, अपने-अपने घर बनाओ, और मज़बूत बनाना।" तीनों चल पड़े। रास्ते में झाड़ियाँ मिलीं, भेड़ें मिलीं, और वे गाते जा रहे थे, "टिक-टिक, टप-टप, तीन सूअर चले छप-छप!"

पहले छोटे सूअर को एक आदमी मिला, जिसकी गाड़ी में भूसा भरा था। सूअर बोला, "भूसा हल्का, भूसा झट-पट, घर बन जाएगा चट-पट!" तभी वहाँ एक भेड़िया आया, लंबा-दुबला और भूखा। "छोटे सूअर, छोटे सूअर, दरवाज़ा खोलो!" "नहीं-नहीं, मेरी ठुड्डी के बालों की कसम, नहीं खोलूँगा!" "तो मैं फूँकूँगा, फू-फू करके फूँकूँगा, और तेरा घर उड़ा दूँगा!" फू! फू! सुर्र! भूसा उड़ गया, और सूअर भाग गया।

दूसरे छोटे सूअर को एक आदमी मिला, जिसकी गाड़ी में लकड़ियाँ थीं। सूअर बोला, "लकड़ी सस्ती, लकड़ी सुंदर, बन गया घर, आराम अंदर!" वह अभी बैठा ही था कि पहला छोटा सूअर दौड़ता हुआ अंदर आ गया, और पीछे-पीछे भेड़िया भी आ गया। "छोटे सूअर, छोटे सूअर, दरवाज़ा खोलो!" "नहीं-नहीं, मेरी ठुड्डी के बालों की कसम, नहीं खोलूँगा!" "तो मैं फूँकूँगा, फू-फू करके फूँकूँगा, और तेरा घर उड़ा दूँगा!" फू! फू! कड़-कड़-धड़ाम! लकड़ियाँ गिर पड़ीं, और दोनों छोटे सूअर भाग गए।

तीसरे छोटे सूअर को एक आदमी मिला, जिसकी गाड़ी में ईंटें थीं। सूअर बोला, "ईंटें भारी, ईंटें धीमी, पर ईंटें टिकेंगी, नहीं हिलेंगी।" पूरे हफ़्ते वह काम में लगा रहा, ईंट पर ईंट, ईंट पर ईंट। उसने मज़बूत लकड़ी का दरवाज़ा लगाया और ऊँची चिमनी बनाई। उसने अभी आग जलाई ही थी कि दोनों छोटे सूअर लुढ़कते-पुढ़कते रास्ते से दौड़े आए। "जल्दी अंदर आओ!" वह बोला। खट! कुंडी लग गई, और तीनों भाई अंदर सुरक्षित और गरम-गरम बैठ गए।

फिर भेड़िया आ पहुँचा। "छोटे सूअर, छोटे सूअर, दरवाज़ा खोलो!" "नहीं-नहीं, मेरी ठुड्डी के बालों की कसम, नहीं खोलूँगा!" "तो मैं फूँकूँगा, फू-फू करके फूँकूँगा, और तेरा घर उड़ा दूँगा!" उसने इतना फूँका कि उसके कान गुलाबी हो गए। उसने इतना फूँका कि उसकी पूँछ खड़ी हो गई। पर एक भी ईंट नहीं हिली। तब भेड़िये ने एक चाल सोची। "छोटे सूअर, मुझे एक खेत पता है, जिसमें बढ़िया शलजम लगे हैं। कल सुबह छह बजे मिलना, हम साथ मिलकर खोदेंगे।"

तीसरा छोटा सूअर बुद्धू नहीं था। वह पाँच बजे उठ गया, दौड़ता हुआ खेत पहुँचा, और मुर्गे के बाँग देने से पहले ही टोकरी भर शलजम लेकर घर लौट आया। छह बजे भेड़िये ने दरवाज़ा खटखटाया। "छोटे सूअर, तैयार हो?" "तैयार?" सूअर ने दरवाज़े के अंदर से कहा। "मैं तो जाकर लौट भी आया, और शलजम बर्तन में पक रहे हैं। बहुत स्वादिष्ट हैं, धन्यवाद!" भेड़िये ने गुस्से में पंजा पटका। और फिर उसने अपनी पूरी ज़िंदगी की सबसे लंबी साँस भरी।

वह फूँकता गया, फूँकता गया, जब तक फूँक ख़त्म नहीं हो गई। उसमें बस एक छोटी-सी चीं-चीं बची। डगमगाता हुआ वह छत पर चढ़ा, ताकि चिमनी से नीचे झाँक सके। अब आग बुझी हुई थी, और चिमनी के ठीक नीचे सूअरों ने गुनगुने पानी का बड़ा-सा टब रखा था। फिसल-फिसल, धम्म, छपाक! भेड़िया साबुन के झाग में आ गिरा। वह उछलकर बाहर निकला, नाक पर एक बुलबुला लिए, और पहाड़ी के पार भाग गया, फिर कभी लौटकर नहीं आया।

अगले दिन माँ मिलने आई, और वह बहुत खुश हुई। पहले छोटे सूअर ने भूसे के नरम बिस्तर बनाए। दूसरे छोटे सूअर ने आग के लिए लकड़ियाँ सजाईं। तीसरे छोटे सूअर की ईंटें सबको चारों ओर से सँभाले रहीं। उस रात हवा पगडंडी से होकर आई। उसने फू कहा, बहुत धीरे से। उसने फू-फू कहा, बहुत हल्के से। पर कुछ भी नहीं हिला। तीनों छोटे सूअर एक कतार में लेटे थे, गरम-गरम, पेट भर शलजम खाकर। शुभ रात्रि, छोटे सूअरो। शुभ रात्रि।
हम क्या सीख सकते हैं
मन लगाकर और धीरज से काम करो, तो तुम सुरक्षित और गर्म रहोगे।
किनके लिए सबसे अच्छी: उम्र 3–8 साल
दोहराई जाने वाली पंक्तियाँ और शांत अंत इस कहानी को ३ से ८ साल के बच्चों के लिए सुकून भरा बनाते हैं।
यह कहानी कहाँ से आई
The Story of the Three Little Pigs — Traditional English tale (anonymous), c. 1800. Lullaquill द्वारा सोने के समय के लिए दोबारा सुनाई गई। यह एक पुरानी, सार्वजनिक कहानी का हमारा अपना नया रूप है।
आज रात की कहानी का हीरो बनाइए अपने बच्चे को
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रात की टोपी पहने छोटी खरगोश लूना हर रात तुम्हें कहानी सुनाती है।
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