खरगोश और कछुआ
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कहानी में क्या होता है
खरगोश बहुत तेज़ दौड़ता है और अपनी तेज़ी पर इतराता है। जब धीमा कछुआ उसे दौड़ की चुनौती देता है, तो पूरा मैदान देखने आ जाता है। पवनचक्की तक पहले कौन पहुँचेगा? धैर्य और दोस्ती की यह कोमल कहानी सोने से पहले सुनाने के लिए बिल्कुल सही है।

एक हरे-भरे मैदान में एक खरगोश रहता था। वह बहुत, बहुत तेज़ दौड़ता था। सर्र! वह मैदान के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँच जाता, और तुम उसका नाम भी पूरा न ले पाते। उसे सबको यह बताना बहुत पसंद था। एक धूप भरी सुबह कछुआ धीरे-धीरे वहाँ से गुज़रा। टप... टप... टप... खरगोश हँस पड़ा। "नमस्ते कछुए भैया! कहीं जा रहे हो क्या? इस चाल से तो तुम अगले हफ़्ते पहुँचोगे!"

कछुए को गुस्सा नहीं आया। वह बस मुस्कुरा दिया। "मैं धीरे चलता हूँ," उसने कहा, "पर जहाँ जाना होता है, वहाँ पहुँच ही जाता हूँ। चलो, मेरे साथ दौड़ लगाओगे?" खरगोश इतना हँसा कि घास पर लोट-पोट हो गया। "तुम? और मेरे साथ दौड़? हा हा हा!" सारे जानवर सुनने आ गए। "दौड़! दौड़!" चिड़ियाँ चीं-चीं करके बोलीं। "ठीक है," खरगोश बोला। "कल सुबह। उस बड़े पेड़ से शुरू करके, पहाड़ी पर बनी पवनचक्की तक।"

अगली सुबह सब दौड़ देखने आए। समझदार बूढ़े उल्लू दादा ने एक पत्ता ऊपर उठाया। "तैयार... सावधान... चलो!" सूऊऊ! खरगोश तीर की तरह भागा। वह इतना तेज़ भागा कि उसके पीछे धूल उड़ने लगी। कछुए ने एक पैर आगे रखा, फिर दूसरा। टप... टप... टप... "जीतो कछुए, जीतो!" छोटे-छोटे खरगोश के बच्चे चिल्लाए। जल्दी ही खरगोश दूर एक नन्हा-सा बिंदु बन गया, और कछुआ अभी बड़े पेड़ के पास ही था।

पवनचक्की के आधे रास्ते पर खरगोश ने पीछे मुड़कर देखा। कछुआ उसे कहीं नहीं दिखा। "हा!" वह बोला। "यह तो बहुत आसान है। वह तो कई घंटों में यहाँ पहुँचेगा। मेरे पास थोड़ा आराम करने का समय है।" वह सेब के एक छायादार पेड़ के नीचे लेट गया। घास नरम थी। मधुमक्खियाँ भन-भन कर रही थीं। धूप गुनगुनी थी। "बस ज़रा-सी झपकी," खरगोश ने कहा, और एक बड़ी-सी जम्हाई ली। और जल्दी ही वह गहरी नींद में सो गया, खर्र-खर्र करके धीरे-धीरे खर्राटे लेते हुए।

उधर कछुआ चलता रहा। टप... टप... टप... वह न दौड़ा, और न रुका। वह तालाब के पास से गुज़रा, जहाँ मेंढक बोले, "चलते रहो!" वह फूलों के पास से गुज़रा, जहाँ तितलियाँ बोलीं, "तुम कर सकते हो!" उसके पैर थक गए थे, पर वह अपने आप से कहता रहा, "धीरे-धीरे, पर चलते रहना। धीरे-धीरे, पर चलते रहना।" और कदम-कदम चलते हुए वह पहाड़ी चढ़कर सेब के पेड़ तक आ पहुँचा।

वहाँ खरगोश गहरी नींद में सो रहा था, और उसकी नाक पर एक तितली बैठी थी। कछुए ने उसे नहीं जगाया। उसने खरगोश का मज़ाक भी नहीं उड़ाया। वह चुपचाप आगे निकल गया। टप... टप... टप... वह पहाड़ी पर चढ़ता गया, पवनचक्की के और पास, और पास। आख़िरी रेखा पर इंतज़ार करते जानवरों को अपनी आँखों पर यक़ीन ही नहीं हुआ। "वो देखो, कछुआ!" वे फुसफुसाए। "कछुआ आ रहा है!"

आख़िर खरगोश की आँख खुली। उसने अँगड़ाई ली। उसने आसमान की ओर देखा। सूरज तो डूबने वाला था! "अरे नहीं!" वह उछलकर खड़ा हुआ और अपनी लंबी टाँगों से जितना तेज़ भाग सकता था, भागा। सर्र, सर्र, सर्र! पर बहुत देर हो चुकी थी। जैसे ही वह पहाड़ी की चोटी पर पहुँचा, कछुए ने पवनचक्की के पास अंतिम रेखा पार कर ली। सबने तालियाँ बजाईं। "कछुए की जय!"

खरगोश हाँफ रहा था। उसे थोड़ी शर्म आई। फिर उसने अपना पंजा आगे बढ़ाया। "शाबाश कछुए भैया," वह बोला। "तुम सच में जीत गए।" "शुक्रिया," कछुए ने प्यार से कहा। "तुम मुझसे बहुत तेज़ हो। पर तुम रुक गए, और मैं चलता रहा।" उस दिन के बाद खरगोश ने कभी घमंड नहीं किया। वह और कछुआ पक्के दोस्त बन गए, और दोनों ने साथ-साथ बहुत से सूर्यास्त देखे। धीरे-धीरे, पर चलते रहना। शुभ रात्रि।
हम क्या सीख सकते हैं
धीरे-धीरे चलते रहने वाला और हार न मानने वाला मंज़िल तक ज़रूर पहुँचता है।
किनके लिए सबसे अच्छी: उम्र 3–8 साल
छोटे, शांत वाक्य और प्यारे जानवर 3 से 8 साल के बच्चों को चैन से सोने में मदद करते हैं।
यह कहानी कहाँ से आई
The Tortoise and the Hare (Perry Index 226) — Aesop, 550 BCE. Lullaquill द्वारा सोने के समय के लिए दोबारा सुनाई गई। यह एक पुरानी, सार्वजनिक कहानी का हमारा अपना नया रूप है।
आज रात की कहानी का हीरो बनाइए अपने बच्चे को
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रात की टोपी पहने छोटी खरगोश लूना हर रात तुम्हें कहानी सुनाती है।
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