लाल टोपी वाली लड़की
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कहानी में क्या होता है
लाल टोपी वाली लड़की अपनी नानी के लिए रोटी और शहद की टोकरी ले जाती है। जंगल में उसे एक चालाक भेड़िया मिलता है और वह माँ से किया वादा भूल जाती है। अच्छी बात है कि मदद समय पर आ जाती है और अंत में सब सुरक्षित और खुश रहते हैं।

एक बार की बात है, एक छोटी-सी लड़की थी। वह हमेशा लाल रंग का चोगा पहनती थी, जिसमें लाल टोपी लगी थी। उसे उसकी नानी ने सिलकर दिया था। वह उसे इतना पसंद करती थी कि सब उसे "लाल टोपी" कहकर बुलाने लगे। एक सुबह उसकी माँ ने कहा, "बेटा, नानी को ज़ुकाम हो गया है। यह टोकरी ले जाओ, इसमें ताज़ी रोटी और शहद है। सीधे रास्ते पर ही चलना, और अनजान लोगों से बातें करने मत रुकना।" "पक्का वादा, माँ," लाल टोपी बोली, और फुदकती-कूदती चल पड़ी।

रास्ता जंगल के बीच से होकर जाता था, ऊँचे-ऊँचे हरे पेड़ों के नीचे से। चिड़ियाँ चहक रही थीं। तितलियाँ नाच रही थीं। लाल टोपी भी गुनगुनाती चली जा रही थी। तभी एक पेड़ के पीछे से एक बड़ा-सा भूरा भेड़िया निकल आया। उसकी नाक लंबी थी और मुस्कान बड़ी चालाक। "सुप्रभात, प्यारी बिटिया," उसने बड़ी मीठी आवाज़ में कहा। "इतनी सुंदर टोकरी लेकर कहाँ जा रही हो?" लाल टोपी अपना वादा भूल गई। वह बोली, "मैं अपनी नानी के घर जा रही हूँ। वह इसी रास्ते के आख़िर में है।"

"अरे वाह!" भेड़िया बोला। "लेकिन देखो तो, कितने सुंदर फूल खिले हैं! नानी को फूलों का एक गुलदस्ता कितना अच्छा लगेगा!" लाल टोपी ने देखा। लाल पोस्ता के फूल, नीले कॉर्नफ़्लावर, पीले बटरकप! "हाँ, नानी को ज़रूर पसंद आएगा," लाल टोपी बोली। तो वह रास्ते से उतरकर फूल तोड़ने लगी। और जब वह फूल तोड़ रही थी, तब भेड़िया हवा की तरह तेज़ दौड़ा, और सबसे छोटे रास्ते से नानी के घर पहुँच गया।

खट-खट! "कौन है?" नानी ने पूछा। "मैं हूँ, लाल टोपी," भेड़िया पतली, चीं-चीं आवाज़ में बोला। लेकिन नानी बहुत समझदार थीं। उन्होंने खिड़की से झाँका, तो एक बड़ी-सी भूरी पूँछ दिखी। "यह तो कोई बच्ची नहीं है!" वे धीरे से बोलीं। जल्दी से वे लकड़ी की बड़ी अलमारी में छिप गईं। भेड़िया अंदर आया। बिस्तर ख़ाली था। उसने नानी की टोपी और चश्मा पहन लिया। फिर वह बिस्तर में घुस गया और कंबल नाक तक ओढ़ लिया।

थोड़ी देर में लाल टोपी अपने फूल लेकर आ गई। "नानी?" उसने पुकारा। "पास आओ, मेरी बच्ची," बिस्तर से एक भारी आवाज़ आई। लाल टोपी पास गई। "नानी, आपके कान कितने बड़े-बड़े हैं!" "तुम्हारी बात अच्छे से सुनने के लिए।" "नानी, आपकी आँखें कितनी बड़ी-बड़ी हैं!" "तुम्हें अच्छे से देखने के लिए।" "नानी, आपके दाँत कितने बड़े-बड़े हैं!" और तभी लाल टोपी ने देखा कि कंबल के नीचे से एक बड़ी-सी भूरी पूँछ बाहर निकली हुई है।

"आप मेरी नानी नहीं हैं!" लाल टोपी चिल्लाई। "बचाओ!" ठीक उसी पल अलमारी का दरवाज़ा धड़ाम से खुल गया। "बचाओ!" नानी भी पुकार उठीं। पास से एक लकड़हारा गुज़र रहा था। उसने आवाज़ सुनी और दौड़कर अंदर आ गया। "चलो भेड़िये, निकलो यहाँ से!" वह ज़ोर की आवाज़ में बोला। भेड़िया इतना चौंक गया कि टोपी पहने-पहने ही खिड़की से कूद गया और घने जंगल में भाग गया। वह फिर कभी वापस नहीं आया।

नानी अलमारी से बाहर आईं और उन्होंने लाल टोपी को कसकर गले लगा लिया। "तुम ठीक हो न, मेरी बच्ची?" "हाँ नानी। आप ठीक हैं?" "अब हूँ," नानी हँसकर बोलीं। उन्होंने भले लकड़हारे को धन्यवाद कहा, और सब साथ बैठ गए। उन्होंने ताज़ी रोटी मीठे शहद के साथ खाई और गरम-गरम चाय पी। और नानी ने फूलों को एक मर्तबान में सजा दिया। वे बहुत ही सुंदर लग रहे थे।

घर लौटने का समय हुआ, तो लाल टोपी रास्ते पर ही चलती रही। एक बार भी रास्ते से नहीं उतरी। "अब से," उसने मन ही मन कहा, "मैं अपना वादा हमेशा याद रखूँगी, और अनजान लोगों को नहीं बताऊँगी कि मैं कहाँ जा रही हूँ।" घर पहुँची, तो माँ ने उसे ज़ोर से गले लगा लिया। और उस रात लाल टोपी अपने आरामदेह बिस्तर में चैन की नींद सो गई, सही-सलामत, फूलों और शहद के सपने देखते हुए। शुभ रात्रि।
हम क्या सीख सकते हैं
माँ की बात सुनो और अजनबियों को मत बताओ कि तुम कहाँ जा रहे हो, तब तुम सुरक्षित रहोगे।
किनके लिए सबसे अच्छी: उम्र 3–8 साल
दोहराव वाले शब्दों और सुरक्षित अंत वाली कोमल कहानी, जो 3 से 8 साल के बच्चों के लिए सोने से पहले ठीक है।
यह कहानी कहाँ से आई
Le Petit Chaperon rouge (1697) / Rotkäppchen (KHM 26, 1812) — Charles Perrault; Jacob and Wilhelm Grimm, c. 1697. Lullaquill द्वारा सोने के समय के लिए दोबारा सुनाई गई। यह एक पुरानी, सार्वजनिक कहानी का हमारा अपना नया रूप है।
आज रात की कहानी का हीरो बनाइए अपने बच्चे को
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