सम्राट के नए कपड़े
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कहानी में क्या होता है
सम्राट को नए कपड़े इतने पसंद हैं कि दो अजनबी उसे जादुई कपड़े का वादा करते हैं, जो मूर्खों को नहीं दिखता। कोई यह मानने की हिम्मत नहीं करता कि उसे कुछ नहीं दिख रहा, जब तक एक छोटी बच्ची सच नहीं कह देती। एक कोमल, हँसमुख कहानी, गर्म अंत के साथ।

बहुत पहले की बात है। लाल छतों वाला एक शहर था, ठंडे नीले समुद्र के किनारे। वहाँ एक सम्राट रहता था, जिसे नए कपड़े बहुत पसंद थे। उसके पास दिन के हर घंटे के लिए एक अलग कोट था। नाश्ते के लिए एक कोट था, और दोपहर के खाने के लिए एक और कोट। खिड़की से बाहर झाँकने के लिए भी उसका एक खास कोट था। जब लोग पूछते, "सम्राट कहाँ हैं?" तो जवाब हमेशा एक ही होता। "वो अपने कपड़ों के कमरे में हैं, कोट पहनकर देख रहे हैं!"

एक सुबह दो अजनबी महल के फाटक पर आए। वे बहुत झुककर बोले, "हम जुलाहे हैं। हम दुनिया का सबसे बढ़िया कपड़ा बुनते हैं। और वो जादुई कपड़ा है! जो बेवकूफ़ होता है, या अपने काम में अच्छा नहीं होता, उसे वो कपड़ा बिल्कुल दिखाई नहीं देता।" "जादुई कपड़ा!" सम्राट चिल्लाया। "जल्दी से मेरे लिए एक सूट बनाओ!" उसने उन्हें रेशम और सोने का धागा दिया। जुलाहों ने सब कुछ अपने झोलों में छिपा लिया, और खाली करघे पर जा बैठे।

खट-खट, खट-खट, चलने लगा खाली करघा। खट-खट, खट-खट, खट-खट। जुलाहे सारा दिन बुनते रहे, पर हाथ में कुछ भी नहीं था। थोड़ी देर में सम्राट ने अपने सबसे बूढ़े मंत्री को देखने भेजा। बूढ़े मंत्री ने अपना चश्मा लगाया। उसने करघे को देखा। फिर से देखा। "अरे राम!" उसने मन में सोचा। "मुझे तो कुछ भी नहीं दिख रहा! क्या मैं बेवकूफ़ हूँ? किसी को पता नहीं चलना चाहिए।" तो वो मुस्कुराया और सिर हिलाया। "कितने सुंदर रंग हैं!" उसने कहा। और खट-खट, खट-खट, चलता रहा खाली करघा।

आख़िर सम्राट खुद देखने आया। उसके पीछे-पीछे सारे दरबारी और दरबारिनें भी आईं। "है ना सुंदर?" जुलाहों ने अपने खाली हाथ ऊपर उठाकर कहा। सम्राट ने घूरकर देखा। उसे न कपड़ा दिखा, न धागा। "अरे राम!" उसने मन में सोचा। "क्या मैं बेवकूफ़ हूँ? मैं तो सम्राट हूँ! किसी को पता नहीं चलना चाहिए।" तो वो मुस्कुराया। "सुंदर!" उसने कहा। "सुंदर!" दरबारियों ने कहा। "सुंदर!" दरबारिनों ने कहा। और उनमें से किसी को भी कुछ नहीं दिख रहा था।

सारी रात जुलाहे हवा में कैंची चलाते रहे। कतर-कतर, कतर-कतर, कुछ भी नहीं काटते हुए। टाँके-टाँके, टाँके-टाँके, कुछ भी नहीं सिलते हुए। सुबह उन्होंने अपने हाथ ऊपर उठाए, जैसे उनमें कोई बहुत हल्की चीज़ हो। "ये रही पतलून। ये रहा कोट। आपको तो पता भी नहीं चलेगा!" सम्राट ने अपना नीला मखमली चोगा उतारा और अपने लंबे ऊनी अंदर के कपड़ों में खड़ा हो गया। जुलाहों ने उसे बटन-बटन करके कुछ भी नहीं पहनाया। फिर वे झुके, पिछले दरवाज़े से दबे पाँव निकले, और पहाड़ी के पार चले गए।

धूप में सम्राट बाहर निकला, ठोड़ी ऊँची और सिर पर मुकुट। ढोल बजने लगे, ढम-ढमा-ढम, ढम-ढमा-ढम। सारा शहर खड़ा होकर देख रहा था। सबने जादुई कपड़े की बात सुनी थी, और कोई भी बेवकूफ़ नहीं दिखना चाहता था। "वाह, क्या कोट है!" वे बोले। "कितना लंबा, सुंदर चोगा है!" हर कोई दूसरे को देखता, और हर कोई मुस्कुराता रहता। ढम-ढमा-ढम, बजते रहे ढोल। और फिर भी कोई पहले कुछ कहने को तैयार नहीं था।

तभी भीड़ के आगे से एक छोटी-सी आवाज़ आई। एक नन्ही बच्ची अपने पापा के कंधों पर ऊँची बैठी थी, और वो देखती रही, देखती रही। "अरे, इन्होंने तो सिर्फ़ अंदर के कपड़े पहने हैं!" वो बोली। सारी गली चुप हो गई। "सुना तुमने?" उसके पापा ने फुसफुसाकर कहा। फुसफुसाहट गली में ऐसे दौड़ी, जैसे घास में हवा। "सिर्फ़ अंदर के कपड़े! सिर्फ़ अंदर के कपड़े!" सम्राट ने नीचे देखा। ये रहे उसके छोटे-छोटे लकड़ी के बटन। ये रहे उसके अपने दो घुटने।

उसके गाल गुलाबी हो गए। फिर उसके कंधे हिलने लगे। "हो, हो, हो!" सम्राट हँस पड़ा। "सच में, मैं तो ऐसा ही हूँ!" और सारा शहर उसके साथ हँस पड़ा, देर तक, प्यार से। उसने नन्ही बच्ची के सामने झुककर कहा, "शुक्रिया। तुमने मुझे सच बताया।" उस रात उसने अपना पुराना धारीदार नाइटशर्ट पहना, वही नरम वाला, जिसकी कोहनी पर पैबंद लगा था। सबको वो दिख रहा था। और उसे पहनकर चारों ओर गर्माहट लग रही थी। "यही," उसने जम्हाई लेकर कहा, "दुनिया का सबसे बढ़िया कपड़ा है।" शुभ रात्रि।
हम क्या सीख सकते हैं
जो सच दिखे, वही बोलो, चाहे सब चुप हों।
किनके लिए सबसे अच्छी: उम्र 3–8 साल
दोहराई जाने वाली आवाज़ें और अंत की प्यारी हँसी इसे सोने से पहले शांत बनाती हैं।
यह कहानी कहाँ से आई
Keiserens nye Klæder (The Emperor's New Clothes) — Hans Christian Andersen, c. 1837. Lullaquill द्वारा सोने के समय के लिए दोबारा सुनाई गई। यह एक पुरानी, सार्वजनिक कहानी का हमारा अपना नया रूप है।
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रात की टोपी पहने छोटी खरगोश लूना हर रात तुम्हें कहानी सुनाती है।
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